
भारत में बहुत प्राचीन काल से आम का प्रवर्धन बीज द्वारा किया जाता है, परन्तु विशेष किस्म में ठीक उसी प्रकार के फल देने वाले पौधे प्राप्त करने के लिए वानस्पतिक प्रसारण अत्यन्त आवश्यक है| यदि आप आम की व्यावसायिक बागवानी की अधिक जानकारी चाहते है, तो यहां पढ़ें- आम की खेती कैसे करें
आम के पौधे तैयार करना
आम का प्रवर्धन हेतु आम में मोनो व पोली एमिब्रयोनिक किस्म के बीज होते हैं, पॉली एम्ब्रियोनिक में एक से अधिक भ्रूण (एम्ब्रिया) होते हैं| परन्तु मोनो एम्ब्रियानिक में एक ही एम्ब्रियो होता है| पॉली एम्ब्रियोनिक किस्मों में बीज से बने लगभग सभी पौधों में मातृ पेड़ के गुण होते हैं| इसलिए ऐसे पौधों की मूलवृन्त के रूप में लाना अधिक लाभदायक होगा|
आम का प्रवर्धन के लिए, कुछ पॉली एम्ब्रियानिक किस्मों के नाम हैं, जैसे- पीलीपीटियम, ओलूर, अम्बिलावी, विलाई-कोलम्बन, बम्पाकाई, ये प्रजातियाँ प्राय: दक्षिण पूर्व एशिया जैसे- मलाया, फिलिपाइन और इन्डोनेशिया में प्रचुर मात्रा में पाई जाती है| भारत में पायी जाने वाली आम की जातियां प्राय: एक भ्रूणीय होती है और इनके बीज में उपस्थित एम्ब्रियों संकरीकरण रीति द्वारा बनते हैं|
इस कारण इन बीजों से बने पौधों के गुणों में समानता नहीं होती एवं वांछित गुणों वाले पेड़ बीज द्वारा नहीं बनाये जा सकते| निश्चित किस्म का पेड़ बनाने के लिए भारत में वानस्पतिक प्रवर्धन विधि प्रयोग में लायी जाती है| इस विधि से बने पौधे जल्दी फल देते हैं|
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वानस्पतिक आम का प्रवर्धन में सर्वप्रथम मूलवृन्त का चुनाव करते हैं, जैसा कि ऊपर बताया गया है, मूलवृन्त में निश्चित गुणों का समन्वय करने के लिए पाली एम्ब्रियोनिक बीज से पौधे प्रयोग में लाये जाने चाहिए| इसके अतिरिक्त कलम या गुटी से बने पौधे भी मूलवृन्त के रूप में प्रयुक्त हो सकते हैं| प्राय: देसी आम के बीज से उगे पौधे ही मूलवृन्त के रूप में इस्तेमाल किये जाते हैं|
आम का प्रवर्धन हेतु आम से निकाले गये बीज (गुठली) को जितना जल्द हो सके, नर्सरी में बो देना चाहिए| देर करने से उनकी जमने की शक्ति कम होने लगती है, बीजू पौधे बौने के लगभग एक से डेढ़ माह पश्चात् अन्य पौधशाला में लगाने योग्य हो जाते हैं, भली प्रकार तैयार खेत में 40 सेंटीमीटर पंक्ति से पंक्ति और 20 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी रखकर रोपित कर देना चाहिए|
व्यापारिक दृष्टि से वानस्पतिक आम का प्रवर्धन के लिए 2 मुख्य विधियां प्रयुक्त होती हैं- इनार्किंग (कलम) और वैनियर ग्राफ्टिंग, इन दोनो विधियों में लगभग एक साल के मूलवृन्तों का प्रयोग किया जाता है|
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आम का प्रवर्धन कलम (इनार्किंग)
कलम (इनार्किंग) करने का सर्वोत्तम समय उत्तरी भारत में जुलाई से अगस्त और दक्षिणी भारत में जुलाई से फरवरी तक का होता है| सर्वप्रथम मूलवृन्त को गमले में या घास फूस में बांधकर पैतृक पेड़ के निकट ले जाते हैं| कलम (इनार्किंग) के लिए पैतृक वृक्ष पर उचित शाख का चुनाव करते हैं कलम बांधने वाली शाख की मोटाई लगभग मूलवृन्त की मोटाई के समान ही होनी चाहिये|
आम का प्रवर्धन के लिए कलम (इनार्किंग) के लिए धरातल से लगभग 20 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर 4 सेंटीमीटर लम्बाई की छाल को और थोड़ी लकड़ी को भी मूलवृन्त से निकाल देते हैं, ताकि कैम्बियम पूरी तरह बाहर आ जाए| उसी प्रकार पैतृक वृक्ष पर कलम करने वाली शाख को भी छील देते हैं| अब दोनों शाखों के कटे हुए भागों को एक-दूसरे के साथ लाकर और दबाकर इस प्रकार बांध देते हैं, कि दोनों के बीच हवा न रहे, इसके लिए आमतौर पर पोलिथिन या रफिया घास का प्रयोग करते हैं|
आम का प्रवर्धन हेतु, इस काम के लिए मोम किये हुए धागों और मोटाई में पतले रबड़ के टुकड़ों का प्रयोग भी किया जा सकता है, यदि चौड़े पालीथीन के टुकड़े को पौधों के कटे हुए भागों पर बांध दिया जाए, तो घाव के भरने में अधिक सुविधा होती है| इनार्किंग के लगभग तीन माह के पश्चात् दोनों शाखाओं का जोड़ परिपक्व हो जाता है और कलम की हुई शाखा को पैतृक वृक्ष से काटकर अलग कर देते हैं|
इसी समय मूलवृन्त के ऊपरी भाग को भी काटकर निकाल देते हैं| इस प्रकार तैयार किये हुए पौधों को गमलों में लगाकर आंशिक साये में रख देते हैं| धीरे-धीरे पौधे 5 से 6 माह में दृढ़ हो जाते हैं, इसके बाद पोलिथिन या घास, रेशे या अन्य बंधे पदार्थों को काटकर जोड़ से अलग कर लेते हैं|
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कलम बांधना (विनियर ग्राफ्टिंग)
यह विधि कलम बांधना (विनियर ग्राफ्टिंग) से उत्तम सिद्ध हुई है, इनार्किंग में मूलवृन्त को पैतृक पेड़ों के निकट ले जाया जाता है| जब पैतृक पेड़ बड़े होते हैं, तो मूलवृन्त को ऊंचे प्लेटफार्म पर रखना पड़ता है और वहीं पानी देना पड़ता है, जिसे बड़ी असुविधा होती है| कलिकायन विधि से तैयार किये गये पौधों में सबसे बड़ा दुर्गुण यह है, कि ये बहुत देर में उचित ऊंचाई प्राप्त करते हैं|
आम का प्रवर्धन हेतु, कलम बांधना (विनियर ग्राफ्टिंग) इन दोनों दुर्गुणों से रहित है| इस विधि की विशेषता यह है, कि इसमें पैतृक वृक्षों से काट ली गई पतली डालियाँ ही प्रयोग में लायी जाती हैं| इन कटी हुई पतली डालियों को जिनमें कई कलियाँ होती हैं, नर्सरी में लगे हुए मूलवृन्त के ऊपर कलम बांध देते हैं| इससे बांधे गये पौधे की देखरेख में सुविधा रहती है|
इस विधि में पैतृक वृक्षों से कली युक्त शाखा का चुनाव बड़ी सावधानी से करना चाहिए, यह एक शिखरस्थ शाखा होती है, जिसकी मोटाई पेन्सिल के समान होनी चाहिए और इसकी लम्बाई 6 से 10 सेंटीमीटर की होनी चाहिए| इसके लिये 3 से 4 माह पुरानी बढ़त वाली शाखा का चुनाव करते हैं| इस शाखा की पत्तियों को ग्राफ्ट करने के 1 से 2 सप्ताह पहले ही तोड़ देते हैं, जिससे कि इस शाखा की शिखरस्थ कली फूटने की स्थिति में आ जाए|
आम का प्रवर्धन के लिए, मूलवृन्त 2 से 4 सेंटीमीटर तक के व्यास का होना चाहिए| इतनी मोटाई लगभग एक से डेढ़ साल तक के पौधों की होती है, इस विधि के प्रयोग का सर्वोत्तम समय जुलाई से अगस्त तक है| मूलवृन्त और शाखा का चुनाव कर लेने के पश्चात् मूलवृन्त के तने के एक ओर 5 से 6 सेंटीमीटर लम्बा कर्तन करते हैं और छिलका व लकड़ी को एक उतना तिरछा चीरा लगाकर काट लेते हैं|
अब शाखा के एक ओर एक तिरछा कर्तन करते हैं, ताकि दोनों तिरछे कटे भाग एक-दूसरे से पूर्णतया जोड़े जा सकें| इसलिए दोनों कटे भागों को जोड़कर 200 से 300 गैज वाली मोटे पालीथीन के टुकड़ों से बांध देते हैं तथा ऊपर का भाग खुला छोड़ देते हैं| जब शाखा ऊपर की ओर बढ़ने लगती है, तो मूलवृन्त के ऊपर के भाग को काट देते हैं| ताकि कली अधिक शीघ्रता से बढ़ सके, लगभग 2 से 3 महीनों में प्लास्टिक का बंधन खोल देते हैं|
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