
व्यावसायिक उत्पादन के लिए आम की उन्नत किस्मों की माँग निरन्तर बढ़ती जा रही है| इस कारण नर्सरी का महत्व भी बढ़ता जा रहा है| दूसरी ओर आम की पौधशालाओं के जरिए अधिक लाभ भी कमाया जा सकता है| अच्छी वैज्ञानिक विधियों से सम्भाली गयी नर्सरियों में एक निश्चित इकाई में ज्यादा संख्या में पौधे तैयार किए जा सकते हैं| आम की नर्सरी में सभी क्रियाओं को सावधानीपूर्वक किया जाये तो कम समय में अच्छे तथा स्वस्थ्य कलमी पौधे तैयार किये जा सकते हैं|
इन सावधानियों का प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से कलम की सफलता और पौधों की वृद्धि पर पड़ता है| वैज्ञानिक तकनीकों को ध्यान में रखने से ऐसे पौधे तैयार किये जा सकते हैं, जिन्हें रोपाई के बाद स्थापित किया जा सकता है| आम की वैज्ञानिक तकनीक से बागवानी की जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें- आम की खेती कैसे करें
सामान्य नर्सरी
भ्रूण के आधार पर आम की दो किस्में हैं- बहुभूर्णीय तथा एक-भ्रूणीय| ऐसा समझा जाता है, कि सभी मूलवृन्त जो बहुभूर्णीय गुठलियों से तैयार किए जाते हैं, मातृ वृक्ष के अनुरूप होते हैं| लेकिन भारत में आम की बहुभूर्णीय किस्मों का अत्यन्त सीमित उत्पादन होने के कारण अधिकतर एक भूर्णीय किस्मों को बागों में व्यावसायिक रूप से लगाया जाता है| आम के अत्यधिक विषम जननांगी (हेटरोजाइगस) होने के कारण एक-भूर्णी गुठलियों से निकलने वाले बीजू पौधों से मातृ पौधे की अपेक्षा भिन्न-भिन्न गुण होते हैं तथा अधिकतर बीजू पौधे गुणों में पितृ पौधे की अपेक्षा अच्छे नहीं होते|
इसलिए अधिकांश व्यावसायिक किस्मों का प्रसारण वानस्पतिक विधियों से किया जाता है| जिससे सभी कलमें मातृ पौधे के ही गुण वाली होती हैं| आम के लिए उपयुक्त वानस्पतिक विधियों, जैसे विनियर ग्राटिंग’, भेंट कलम, कलिकायन या ‘साफ्ट वुड ग्राफ्टिंग’ हेतु मूलवृन्त के रूप में बीजू पौधों को प्रयोग में लाया जाता है| बीजू या किसी भी प्रकार के कलमी पौधे से प्राप्त आम की गुठलियों को उगाकर मूलवृन्त प्राप्त किया जाता है|
बीजू पौधे पौधशालाओं में लगभग एक वर्ष बाद कलम लगाने योग्य हो जाते है| यदि इनका रख-रखाव ठीक से हो तो उनमें अच्छी वृद्धि होती है तथा अधिकांश पौधे बंसत ऋतु में ही कलम लगाने योग्य हो जाते हैं| ऐसे पौधे उसी वर्ष वर्षा ऋतु में बागों में रोपाई के लिए प्रयोग में लाये जा सकते हैं|
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आम की गुठलियों में जमने की क्षमता कम दिनों के लिए ही रहती है तथा अंकुरण संग्रहण की विधि पर निर्भर करता है| गुठलियों को बोने से पहले छायादार स्थान पर रखना चाहिए, क्योंकि धूप में रहने से उनका अंकुरण प्रतिशत घट जाता है| प्रयोगों में पाया गया है, कि कम तापमान (5 से 8 डिग्री सेंटीग्रेट) पर संग्रहित गुठलियों में जमने की क्षमता 20 दिनों तक ही रहती है|
दूसरे शब्दों में गुठलियों को गूदे से अलग करने के बाद शीघ्र से शीघ्र बो देना चाहिए तथा यदि उन्हें किसी कारणवश जल्दी न लगाना हो तो पेड़ों की छाया में या किसी भी छायादार स्थान पर जहां नमी हो, रखना उपयुक्त रहता है| पौधशाला के निकट के स्थानों से ही गुठलियाँ इकट्ठी करना अधिक उपयुक्त रहता है| क्योंकि दूर के स्थानों से लाते समय गुठलियों को उचित वातावरण दे पाना कठिन होता है|
गुठलियाँ फैक्टरी से भी लाई जा सकती है, परन्तु यदि उन्हें मशीनों (इक्सपेलर) में दाब कर गूदे से अलग किया जाता है, तो उनके भ्रूण नष्ट हो जाते हैं तथा अंकुरण बहुत ही कम हो जाता है| गुठलियों को ढेरों में एकत्रित किया जाता है| अच्छे आकार की, विकसित और फूली हुई गुठलियों में जमाव अधिक होता है तथा स्वस्थ पौधे निकलते हैं| पतली और अनियमित आकार की गुठलियों के कारण कम जमाव होता है तथा कमजोर पौधे तैयार होते हैं| बहुत हल्की तथा रोगग्रस्त गुठलियों को छाँट कर अलग कर देना चाहिए|
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गुठलियों को लगाने के लिये क्यारियाँ बनाना उपयुक्त रहता है| यदि इन्हें पेड़ों के नीचे छायादार स्थानों पर लगाया जाय तो अधिक अंकुरण होता है| क्यारियों का आकार 1.5 x 5 मीटर रखना चाहिए| आवश्कतानुसार लम्बाई को घटाया या बढ़या जा सकता है| अधिक वर्षा वाले स्थानों पर क्यारियाँ भूमि की सतह से लगभग 15 सेंटीमीटर ऊँची बनानी चाहिए|
क्यारियों में से खरपतवार आदि हटा कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए| गुठलियों को 5 सेंटीमीटर से अधिक गहराई पर ही बोना चाहिए| यदि बीजू पौधों को इन क्यारियों में अधिक दिनों तक रखना हो तो गुठलियों के बीच में पर्याप्त स्थान भी देना चाहिए| गुठलियों की बुआई के बाद क्यारी को सूखे पत्तों या गोबर की खाद से ढक देना चाहिए तथा नियमित सिंचाई करनी चाहिए|
गुठलियों को जमाने की एक और तकनीक काम में लाई जा सकती है| इसके लिए पौधे के नीचे की छायादार नम जगह पर मिट्टी की सतह भुरभुरी बना कर गुठलियों की एक सतह बिछा दी जाती है तथा उन्हें पत्तों और हल्की खाद की 5 सेंटीमीटर की पर्त से ढक दिया जाता है| सिंचाई का ध्यान रखना आवश्यक है, क्योंकि गुठलियाँ शुष्क हो जाने पर जमाव कम हो जाता है|
यह विधि उस समय बहुत उपयुक्त है, जब गुठलियाँ अधिक मात्रा में उपलब्ध हों और क्यारी बनाने की समस्या हो| इस विधि से गुठलियों से निकले पौधे को जल्दी ही क्यारियों में लगाया जाना चाहिए अन्यथा सीमित स्थान में ही अधिक संख्या में होने के कारण पौधे घने हो जाते हैं, जिससे उनमें आपस में पोषक तत्वों तथा प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा हो जाती है| ऐसे पौधे पतले और कमजोर हो जाते हैं|
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लगभग दो माह में, जब बीजू पौधे की पत्तियाँ गाढे हरे रंग की हो जायें तो उन्हें जिन क्यारियों में कलम बांधी जानी है, उसमें लगा देना आवश्यक है| बीजू पौधों को उखाड़ते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पौधों से गुठलियाँ अलग न हों, क्योंकि प्रारम्भिक वृद्धि की अवस्था में पौधा अधिकांश पोषण गुठली में संचित पोषक तत्वों से ही लेता है|
इस अवस्था में पौधों की जड़े छोटी होती हैं और उनकी पोषक तत्व तथा पानी की कुल अवशोषण-क्षमता कम होती है| इस समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि मुख्य जड़ ज्यादा लम्बी न हो जाये| ऐसा होने के पहले ही उन्हें दूसरे स्थान पर लगा देना चाहिए, क्योंकि पौधों की लम्बी जड़ होने के बाद उखाड़ कर दूसरी जगह लगाने पर वे अधिक संख्या में मरते हैं|
नये लगाये गये पौधों की सिंचाई करना अत्यन्त आवश्यक है| यदि उन पौधों को नियमित रूप से सींचा जाय तो पौधे लगभग पांच माह में ही कलम बांधने योग्य हो जाते हैं| बीजू पौधे लगाने के लिए क्यारियाँ अधिक छायादार स्थानों पर नहीं बनानी चाहिए, क्योंकि वहां पौधों में वृद्धि कम होती है| बीजू पौधों को मिट्टी के गमलों या प्लास्टिक के थैलों में भी लगाया जा सकता है|
यह उस अवस्था में ज्यादा लाभप्रद है, जब पौधशाला की मिट्टी ज्यादा रेतीली हो और पौधे उखाड़ते समय पिण्डी (हल्की भूमि होने के कारण) टूट जाती है| पॉलीथीन में लगाये गये पौधों को क्यारियों में जमीन की सतह से कुछ नीचे इस प्रकार से रखना चाहिए कि थैली का ऊपरी सिरा भूमि की ऊँचाई पर हो और सिंचाई सुविधापूर्वक की जा सके| जल निकास का ध्यान रखना भी अति आवश्यक है|
पौधशाला की क्यारियों में गोबर की खाद 8 से 10 टन तथा 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हैक्टर का प्रयोग पौधों को क्यारियों में लगाने के लगभग एक माह बाद करना चाहिए| नए लगाये गए बीजू पौधों की सिंचाई के लिए समुचित प्रबन्ध करना चाहिए| प्रयोग में पाया गया है, कि अच्छी वृद्धि करने वाले बीजू पौधे में कलम बांधने पर कम वृद्धि वाले पौधों के अपेक्षा अधिक सफलता मिलती है|
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इसलिए कलम लगाने के लिए एक-दो सप्ताह पहले से ही पौधों की सिंचाई करनी चाहिए, जिससे उसमें सक्रियता आ जाती है| पौधे की मिट्टी को नियमित रूप से बदलते रहना चाहिए| इसके लिये हर साल तालाब की चिकनी मिट्टी भूमि की ऊपरी सतह पर बिछा देनी चाहिए| इससे पौधे की सरलतापूर्वक पिण्डी बनायी जा सकती है| तालाब की मिट्टी में पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में मिलने के कारण पौधे स्वस्थ्य होते है|
पौधशाला को बिल्कुल खुले स्थानों पर नहीं होना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक धूप और गर्म हवाओं के कारण कलमी पौधों में निकल रही नयी वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा अत्यधिक गर्मी होने के कारण पौधे सूख जाते हैं| यही कारण है कि प्रायः प्रतिकूल जलवायु के कारण पौधे आकार में छोटे रह जाते हैं तथा उन्हें पौधशाला में एक और साल के लिए रखना पड़ता है|
जब तक कि वे बड़े न हो जायें पौधशाला में छाया का प्रबन्ध करने से धूप और पाले से पौधों की रक्षा की जा सकती है| इसके लिए छायादार पौधे जिनकी छाया बहुत अधिक घनी न हो, लगाये जा सकते हैं| कृत्रिम रूप से छाया प्रदान करने के लिए बांसों और बल्लियां के ऊपर फूस का प्रयोग भी किया जा सकता हैं या इनके ऊपर छोटी-छोटी झाड़ियों को काट कर व्यवस्थित कर दिया जाता है| जिनके बीच से धूप छन-छन कर आती है तथा कड़ी धूप का सीधा प्रभाव पौधों के कोमल भागों पर नहीं पड़ता है|
फलस्वरूप पौधों में अच्छी वृद्धि होती है तथा कलम में सफलता का प्रतिशत भी अधिक होता है| इस विधि से कलमी पौधे एक वर्ष में तैयार हो जाते हैं, परन्तु यदि पौधों को पौधशाला में इससे लम्बी अवधि तक रखना हो तो पौधों को बसंत ऋतु आने से पहले दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर देना चाहिए| जिससे उनकी जड़ें सीमित स्थान में ही विकसित होती हैं और विक्रय करने के पौधों का मरने का प्रतिशत कम होता है|
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हाईटेक पौधशाला
अब पॉली हाउस तथा नेट शेड़ हाउस के विकास के साथ हाईटेक नर्सरी स्थापित की जा सकती हैं| जिसमें नियंत्रित तापक्रम एवं आर्द्रता रख कर वर्ष भर पौधे पालीथीन बैग में तैयार किए जा सकते हैं| इसके लिए रूटिंग मीडिया या पॉटिंग मीडिया तैयार कर पॉलीथीन बैग में भरा जाता है| जिसमें एक भाग मिट्टी, एक भाग बालू तथा एक भाग गोबर की सड़ी खाद मिलायी जाती है|
ऐसी तैयार मिट्टी को पूर्व में (मई से जून) सौर्गीकरण द्वारा शोधित कर लिया जाता है| यह पॉलीबैग 12.5 x 25 सेंटीमीटर के काले 400 गेज के अधिक उपयुक्त होते हैं| जुलाई से सितम्बर माह में इसमें पौधे स्थापित किए जा सकते हैं| बाद में इसमें विकसित पौधों में वीनियर, साइड़ ग्राफ्टिंग, सॉफ्ट वुड ग्राफ्टिंग या इपिकोटाईल ग्राफ्टिंग की जा सकती है|
एक आम पॉली हाउस 10 x 15 मीटर के और 2.5 मीटर ऊँचाई वाले हो सकते हैं| जिसमें तापक्रम करीब 30+-2 डिग्री सेंटीग्रेट तथा आर्द्रता 80 से 90 प्रतिशत रखी जा सकती है| इसी प्रकार शेड नेट करीब 40 x 20 मीटर के 3 मीटर उचाई तथा छाव 50 या 75 प्रतिशत रखी जा सकती है| फुहारे द्वारा इसमें आर्द्रता बढ़ाई जा सकती है और सिंचाई का प्रबन्ध किया जा सकता है|
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