हमारे देश में तुलसी (Basil) का पौधा धार्मिक और औषधीय महत्त्व रखता है| इसे हिन्दी में तुलसी, संस्कृत में सुलभा, ग्राम्या, बहुभंजरी तथा अंग्रेजी में होली बेसिल के नाम से जाना जाता है| तुलसी की ओसिमम बेसीलीकम प्रजाति को तेल उत्पादन के लिए उगाया जाता है| तुलसी की इस प्रजाति की भारत में बड़े पैमाने [Read More] …
Agriculture
स्टीविया की खेती: किस्में, रोपाई, सिंचाई, देखभाल और उत्पादन
स्टीविया की खेती (Stevia farming), प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक शक्कर मनुष्य के भोजन का एक अभिन्न हिस्सा रहा है| गन्ना तथा चुकंदर लम्बे समय से शक्कर प्राप्ति का एक प्रमुख स्त्रोत है| हालांकि इन दोनों ही स्रोतों से प्राप्त शक्कर में मिठास का गुण तो होता है, परन्तु मधुमेह से पीड़ितों को इनका [Read More] …
बच की खेती: किस्में, रोपाई, सिंचाई, पोषक तत्व, देखभाल, उत्पादन
बच एरेसी कुल का एक पौधा है| जिसका वानस्पतिक नाम ‘एकोरस केलमस’ है| इसका तना बहुतशाखित एवं भूमिगत होता है| पत्तियां रेखाकार से भालाकार, नुकीली मोटी मध्य शिरा युक्त होती है| इसका पुष्पक्रम 4.8 सेंटीमीटर का स्पेडिक्स होता है| इसके फूल हरापन लिए पीले होते हैं और इसके फल लाल तथा गोल होते हैं| बच [Read More] …
अश्वगंधा की खेती: किस्में, बुवाई, सिंचाई, देखभाल और उत्पादन
अश्वगंधा (Ashwagandha) एक महत्वपूर्ण एवं प्राचीन औषधीय फसल है, जिसका उपयोग देशी चिकित्सा, आयुर्वेद व यूनानी पद्धति में होता है| इसे असवगंधा, नागौरी असगंध नामों से भी जाना जाता है| इसकी ताजी जड़ों से तीव्र गंध आती है, इसलिए इसे अश्वगंधा कहते हैं| शुष्क क्षेत्र की बेकार मिटटी को हरित रूप से सुंदरीकृत करने, उत्पादक [Read More] …
पुदीना (मेंथा) की खेती: किस्में, रोपण, सिंचाई, देखभाल और पैदावार
व्यापारिक जगत में जापानी पुदीना (Mint) को ही मेंथा के नाम से जाना जाता है| लेकिन तकनीकी रूप से मेंथा शब्द पुदीना के एक समूह का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें पुदीना की कई किस्में सम्मिलित हैं, जैसे- जापानी पुदीना या पिपर मिन्ट| इस प्रकार मेंथा के समूह में कई किस्में सम्मिलित हैं, जिनमें से एक [Read More] …
वर्षा आधारित खेती में आय बढ़ाने वाले सुझाव और आधुनिक तकनीकें
वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र देश के कुल खेती क्षेत्रफल के लगभग 60 से 65 प्रतिशत भू-भाग में फैला हुआ है| ये क्षेत्र महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु आदि राज्यों के साथ देश के बाकि राज्यों तक फैला हुआ है| प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से इन [Read More] …
सतावर की खेती: किस्में, रोपण, सिंचाई, खाद, देखभाल और उत्पादन
सतावर का वानस्पतिक नाम एसपैरागस रेसमोसस विभिन्न औषधीय पौधों में सतावर एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है| जिसका उपयोग प्राचीन समय से ही पारम्परिक औषधि के रूप में किया जा रहा है| सतावर एक बहुवर्षीय कन्दयुक्त झाड़ीनुमा औषधीय पौधा है, जिसको शतमूली, सतावरी एवं शतवीर्य भी कहते है| सतावर लिलियसी कुल का पौधा है| सतावर का [Read More] …
गिनी घास की खेती: पशुओं के लिए हरा चारा कई वर्ष तक प्राप्त करें
गिनी घास (Guinea grass) बहुवर्षीय चारा है, चारे की फसलों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है| यह सिंचित स्थिति में पूरे वर्ष भर इससे चारा प्राप्त होता है| जबकि शुष्क दशा में केवल वर्षा काल में ही इससे हरा चारा उपलब्ध होता है| इस फसल को देश के सभी भागों में उगाया जाता है| इस लेख [Read More] …
बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम की खेती: किस्में, बुवाई, देखभाल, उत्पादन
बाजरा पेनिसिटम ग्लूकोमा की फसल दाने तथा हरे चारे के लिए भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जाती है| ऐसे क्षेत्र जहां कम वर्षा और ज्यादा गर्मी पड़ती है, बाजरा पेनिसिटम ग्लूकम बाजरे की फसल अच्छी पैदावार देती है| इसको पशुओं को हरे चारे, कड़बी एवं सायलेज या “हे” के रूप में संरक्षित करके [Read More] …
बाजरा नेपियर संकर घास की खेती: पशुओं के लिए साल भर हरे चारे हेतु
बाजरा नेपियर संकर घास वर्ष में कई कटाईयां देने वाली बहुवर्षीय चारा फसल है| बाजरा नेपियर संकर घास की जड़ों को एक बार रोपण करके उचित प्रबन्धन के द्वारा 4 से 5 वर्षों तक हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है| इस घास से बाजरे जैसा पौष्टिक और रसीला चारा प्राप्त होता है, साथ ही [Read More] …