
गोमूत्र व गोबर एक सस्ता और श्रेष्ठ उर्वरक के रूप में सर्वश्रेष्ठ खाद है| यह भूमि का प्राकृतिक आहार है, भूमि की उर्वरा शक्ति को प्राकृतिक स्थिति में बनाए रखती है| प्रदूषण रहित एवं सस्ती है, इसके लिए किसान को परावलंबी नहीं रहना पड़ता| गोबर व गोमूत्र की खाद से उत्पादित खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट एवं स्वास्थ्यवर्द्धक होते हैं|
गोमूत्र का कृषि में महत्व
खेती जगत से संबंधित वैज्ञानिक एवं प्रसार अधिकारी इस निर्विवाद सत्य पर एकमत हैं, कि रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के प्रयोग से नष्ट हुई भूमि की उर्वरा शक्ति का एकमात्र विकल्प गोबर और गोमूत्र की खाद है| इसके उपयोग से भूमि के सूक्ष्म लाभकारी जीवाणु बढ़ते हैं| भूमि का प्राकृतिक रूप बना रहता है| जो खराब भूमि है, वह ठीक हो जाती है| सिंचाई के लिए कम पानी लगाना पड़ता है, क्योंकि भूमि की जल ग्रहण एवं रोकने की क्षमता बढ़ जाती है|
वर्षा का जल सोखने तथा रोकने की क्षमता बढ़ जाती है| खेत और गाँव के कूड़े-कचरे का उपयोग होता है, वह प्राकृतिक चक्र में आ जाता है| किसानों तथा बैलों को अधिक काम मिलता है| पर्यावरण में सुधार होता है, खाद्यान्न पौष्टिक और सुस्वाद होता है| कीटनाशकों के जहर का अंश हमारे शरीर में नहीं जमता, ग्रामीणों को रोजगार मिलता है, उनका अपना स्वावलंबी तंत्र स्वावलंबी कृषि का आधार बनता है| विदेशी मुद्रा की बचत होती है, देश संपन्नता की ओर बढ़ता है|
गाय के गोबर व गोमूत्र के कंडे की राख एक विलक्षण दुर्गधनाशक होने के साथ ही कीट संहारक पदार्थ है| इसका उपयोग किसान अपने खेतों में खाद तथा कीटनाशक के रूप में भी अनेक वर्षों से करते आए हैं, खेत में राख पड़ने से दीमक इत्यादि कीड़े नहीं पनपते और फसल अच्छी होती हैं, कुकुरबिट्स वर्ग के पौधों पर विशेषतया राख का छिड़काव किया जाता है|
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गोमूत्र के कृषि में संघटक
गोमूत्र में नाइट्रोजन, गन्धक, अमोनिया, कापर, यूरिया, यूरिक एसिड, फास्फेट, सोडियम, पोटैशियम, मैग्नीज, कार्बोलिक एसिड इत्यादि पाये जाते हैं और इसके अतिरिक्त लवण, विटामिन ए, बी, सी, डी, ई, हिप्युरिक एसिड, क्रियाटिनिन, स्वर्ण क्षार पाये जाते हैं|
गोमूत्र का कृषि में उपयोग
भारतीय नस्ल की देशी गायों के एक लीटर गोमूत्र को एकत्रित कर 40 लीटर पानी में घोलकर यदि खाद्यान्न दलहन, तिलहन सब्जी आदि के बीज को 4 से 6 घंटे भिगोकर, खेत में बुआई की जाती है, तो बीज का अंकुरण अच्छा, जोरदार तथा रोग रहित होता है| इसके अतिरिक्त बीज का जमाव जल्दी होता है|
गोमूत्र का प्रयोग फसल सुरक्षा रसायन के रूप में कई तरह से और कई कीड़ों के नियंत्रण के लिये किया जाता है| नीम की पत्ती और गोमूत्र के सहयोग से दस लीटर गोमूत्र में दो से तीन लीटर गोमूत्र को 15 दिन तक किसी डिब्बे में भरकर सड़ाने के बाद छानकर इस एक लीटर दवा को 50 लीटर पानी में घोलकर दोपहर के बाद फसल पर छिड़काव करने से कई प्रकार के कीड़े, नियन्त्रित होते हैं|
जैसे पत्ती, खाने वाला कीड़ा, फल छेदने वाला कीड़ा, तना छेदक आदि| गौमूत्र और तम्बाकू के सहयोग से कीटनाशक बनाया जाता है| इसमें 10 लीटर गोमूत्र में एक किलोग्राम तम्बाकू की सूखी पत्तियों को डालकर उसमें 250 ग्राम नीला थोथा घोलकर 20 दिन तक बन्द करके किसी डिब्बे में रख देते हैं|
20 दिन बाद इसको निकालकर छानकर 1 लीटर दवा को 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से बालदार सुंडी का विशेष नियंत्रण होता है| इसका प्रयोग भी दोपहर के बाद करना अच्छा रहता है| गोमूत्र तथा लहसुन की गन्ध के साथ कीटनाशक बनाकर प्रयोग करने से रस चूसने वाले कीड़े कम होते हैं|
अब इसके लिये दस लीटर गोमूत्र में 500 ग्राम लहसुन कूटकर उसमें 50 मिलीलीटर मिट्टी का तेल मिला देते हैं| इस मिट्टी के तेल एवं लहसुन के मिश्रण को गोमूत्र में डालकर 24 घंटे पड़ा रहने देते हैं| इसके बाद इसमें 100 ग्राम साबुन अच्छी तरह मिलाकर इस मिश्रण को अच्छी तरह हिलाकर बारीक कपड़े से छान लें, एक लीटर दवा को 80 लीटर पानी में घोलकर प्रातःकाल छिड़काव करने से रस चूसक कीड़ों से फसलों को बचाया जा सकता है|
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गोमूत्र का कृषि में कीटनाशक महत्व
गोमूत्र एवं कुछ वनस्पतियों के सहयोग से एक ऐसा कीटनाशक बनाया जाता है, जो लगभग सभी प्रकार के कीड़ों और कुछ रोगों व फसल पर पोषक तत्व के पूरक के रूप में प्रभावशाली होता है और इसके छिड़काव के बाद नील गाय तथा जंगली जानवरों से भी फसल सुरक्षित रहती है|
इसको बनाने के लिये 20 लीटर गोमूत्र यथासम्भव देशी गोवंश का यदि बृद्ध गोवंश हो तो ज्यादा अच्छा रहता है, को अधिकांशतः एकत्र करने की कोशिश करनी चाहिये| गोमूत्र को किसी प्लास्टिक डिब्बे या ड्रम में डाल देना चाहिये, इसके बाद उसमें 5 किलोग्राम नीम की ताजी पत्तियाँ तोड़कर डालनी चाहिये|
नीम की पत्ती डालने के बाद 2 किलोग्राम धतूरा के पंचाग अर्थात् जड़, तना, पत्ती, फूल, फल इत्यादि को ताजा या सुखाकर पहले से रखा हुआ को डालना चाहिये| इसके बाद दो किलोग्राम मदार जो पचांग या पत्ती के रूप में हो सकता है, को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर डालना चाहिये, इसके बाद 500 ग्राम लहसुन कन्द को कुचलकर उसमें डालना चाहिये|
लहसुन कन्द डालने के बाद 250 ग्राम तम्बाकू की पत्तियों को डालना चाहिये| इसके बाद अन्त में 250 ग्राम लाल मिर्च पाउडर को डालकर डिब्बे में किसी लकड़ी की सहायता से हिलाकर ढक्कन को बंद कर अच्छी तरह वायुरोधी बनाकर खुले स्थान पर रख देना चाहिये, रखने के बाद डिब्बे पर धूप लगनी चाहिए| इसके अतिरिक्त रात में ओस पड़ती है, तो सड़ने की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है|
यह प्रक्रिया 40 दिन तक चलने देते हैं, 40 दिन बाद किसी पतले सूती या मलमल के कपड़े से इस घोल को अच्छी तरह डन्डे की सहायता से हिलाकर छान लेते है| छनित तरल पदार्थ का प्रयोग फसल रक्षक रसायन के रूप में करते हैं एवं छनित वनस्पतियों को सुखाकर दीमक इत्यादि के नियंत्रण के लिये भी प्रयोग किया जाता है|
इस दवा का फसल पर प्रयोग करने के लिये एक लीटर दवा को 80 लीटर पानी में घोलकर खड़ी फसल पर छिड़का जाता है| जिससे छेदने वाले, काटकर खाने वाले रस चूसने वाले कीटों का नियंत्रण तो होता ही है, साथ ही फसल पर नील गाय और जंगली भैंसा तथा जंगली सांड भी नुकसान नहीं पहुंचा पाते|
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गोमूत्र कीटनाशक के कृषि में लाभ
फसलों को प्राकृतिक पोषक पदार्थ और कुछ लाभदायक तत्व मिलते हैं, जैसे नाइट्रोजन की मात्रा, इस घोल के छिड़काव से फसल पर कम छिड़कनी पड़ती है| इसके छिड़काव से फसल हरी-भरी हो जाती है एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है| इस कीटनाशी में प्रयोग की जाने वाली सामग्री गावं स्तर पर ही आसानी से मिल जाती है|
इस दवा का प्रयोग मक्का, कपास, तम्बाकू, टमाटर, दलहन, गेहूं, धान, सूरजमुखी, फल, केला, भिन्डी, गन्ना इत्यादि सभी फसलों में सफलतापूर्वक किया जा सकता है| इस तरह वृद्ध गोबंश जैसे- गाय, बैल आदि का उर्सजी पदार्थ मूत्र, जो बहुत आसानी से थोड़ा सावधानी और ध्यान देने से एकत्रित किया जा सकता है|
जिसको एकत्रित करके स्थानीय स्तर पर उपस्थित जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों के सहयोग से कृषि की सुरक्षा की जा सकती है| गोमूत्र का एकत्रीकरण, अपनी सुविधानुसार प्लास्टिक के डिब्बे की सहायता से या पक्की गौशाला के पास पक्की नाली व टंकी की सहायता से एकत्रित कर किया जा सकता है|
इसका प्रयोग कृषि के लिये कीटनाशक के रूप में फसल सुरक्षा के लिये बीजशोधन के लिये टॉनिक के रूप में नाइट्रोजन के पूरक के रूप में नील गाय सांड, भैंसा, जंगली पशु इत्यादि से सुरक्षा हेतु प्रयोग कर अपनी आय में वृद्धि कर पर्यावरण संतुलन बढ़ाने में सहयोग कर सकते हैं| पशुपालन का अवशिष्ट पदार्थ इस तरह बेहतर प्रयोग में प्रयुक्त होकर लाभ प्रदान करेगा|
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